दोस्तों उत्तराखंड भारत के उत्तर में बसा एक पहाड़ी राज्य है। उत्तराखंड में देव स्थान स्थित है। जिस कारण से उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। ओर गंगोत्री भी उत्तराखंड के उत्तरकाशी में स्थित है। उत्तराखंड में बैसाख केअक्षय तृतीया के बाद से यमुनोत्री धाम, गंगोत्री धाम, केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में बने, मंदिरों के कपाट खुल जाते है।

कपाट खुलने के साथ ही यात्रा शुरू हो जाती है। जिसे उत्तराखंड के चार धाम यात्रा कहा जाता है। ज्यादातर लोगों को वहां के मौसम के बारे में, रास्तों के बारे में, किस स्थान पर रात में रुका जाए और वहाँ जाने में कितना खर्चा होगा। इन सब बातों की जानकारी नहीं होती है।

गंगोत्री के बारे में जानकारी

गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखा कमांडो अमर सिंह थापा द्वारा 18वीं शताब्दी के शुरुआत में किया गया था वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण जयपुर के राजघराने द्वारा 20 वीं सदी में किया गया था। यह पवित्र एवं उत्कृष्ट मंदिर सफेद ग्रेनाइट के चमकदार 20 फीट ऊंचे पत्थरों से बना है। इसकी भव्यता देखकर श्रद्धालु सम्मोहित हो जाते है।

भगीरथी नदी गंगोत्री मंदिर से 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित गोमुख से निकलकर कल-कल की आवाज करती हुई पूरी वेग के साथ नीचे की ओर बहती हुई गंगोत्री मंदिर के किनारे से होकर गुजरती है। भागीरथी मंदिर के किनारे किनारे मंदिर के सामने ही श्रद्धालुओं के स्नान करने हेतु मंदिर समिति द्वारा इस स्नानघाट बनाए गए है।

गंगोत्री धाम कैसे पहुंचे  बेस्ट टाइम  यमुनोत्री से गंगोत्री
गंगोत्री धाम कैसे पहुंचे बेस्ट टाइम यमुनोत्री से गंगोत्री

भागीरथी नदी के अत्यधिक ठंडे बर्फीले पानी में स्नान करने के बाद मंदिर में मां गंगा की पूजा अर्चना करते है। मंदिर के पास ही भागीरथी शीला मौजूद है। कहा जाता है, कि इसी शीला पर बैठकर अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए मां गंगा को धरती पर लाने के लिए तप किया था। गंगोत्री में सुबह और शाम को गंगा आरती होती है। जिसमें श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ सम्मिलित होते है।

दोस्तों गंगोत्री गंगा नदी का उद्गम स्थल है। यहां से गंगा अपना 2500 किलोमीटर का सफर तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

गंगा नदी को भारत की सबसे पवित्र और पावन नदी का सम्मान प्राप्त है। सर्दियों में गंगोत्री धाम में बहुत फर्क पड़ती है। जिस कारण गंगोत्री मंदिर से 30 किलोमीटर दूर स्थित मुखबा गांव में गंगा जी की पूजा की जाती है। सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार हर साल बैसाख के अक्षय तृतीया को मां गंगा के डोली उनके शीतकालीन प्रवास स्थान मुखबा से बड़े धूमधाम के साथ, गंगोत्री धाम के स्थित मां के मंदिर में लाई जाती है। और पूरे विधि विधान के साथ उनकी स्थापना कर ग्रीष्मकालीन पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल देश के सभी प्रदेशों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पावन पवित्र गंगोत्री धाम पहुंचते है।

ज्यादातर श्रद्धालु यमुनोत्री धाम के बाद ही गंगोत्री धाम जाते है। यमुनोत्री धाम ( yamunotry dham) की जानकारी हमारी पिछले लेख में देखें।

यमुनोत्री से गंगोत्री

यमुनोत्री से गंगोत्री की दूरी 22 किलोमीटर की है। यमुनोत्री से गंगोत्री जाने के लिए वापस धरासू आना पड़ता है। धरासू से उत्तरकाशी और हरशील होते हुवे गंगोत्री पंहुचा जाता है।

गंगोत्री धाम जाने का सबसे अच्छा समय

गंगोत्री धाम जून के महीने में जाने से बचें और सितंबर के आखिरी सप्ताह से कपाट बंद होने तक के समय का चयन करें। मुझे पूरी उम्मीद है। कि आपकी यात्रा काफी सुलभ यादगार, कम खर्चे वाली रहेगी।

आमतौर पर लोग गंगोत्री, मई जून में सबसे ज्यादा संख्या में जाते है। जिससे वहाँ बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ हो जाती है। जिस कारण होटलों का किराया 2 से 3 गुना ज्यादा होता है।

हरिद्वार से गंगोत्री धाम कैसे पहुंचे?

दोस्तों आज हम आपको हरिद्वार से सीधे गंगोत्री धाम की यात्रा के बारे में बताएंगे। गंगोत्री धाम पहुंचने के लिए सबसे पहले हरिद्वार पहुंचना होता है। हरिद्वार देश के अलग-अलग शहरों से रेल मार्ग और सड़क मार्ग से जुड़ा है। हरिद्वार में काफी संख्या में धर्मशाला, होटल और लॉज बने है। हरिद्वार से गंगोत्री धाम 287 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जो केवल सड़क मार्ग से जुड़ा है। गंगोत्री धाम जाने के लिए सुबह-सुबह हरिद्वार बस अड्डे से नियमित रूप से बसे चलती है।

इसके अलावा हरिद्वार में कई टूरिस्ट एजेंसी भी है। जहां से आप प्रतिदिन या प्रति किलोमीटर के हिसाब से कार जीप या टेंपो ट्रैवलर भी बुक करा कर जा सकते है। श्रद्धालु गंगोत्री धाम निजी वाहन से भी जा सकते है। लेकिन अपने साथ कुशल ड्राइवर को ही लेकर चले। हरिद्वार से गंगोत्री जाने वाली सड़क भी काफी अच्छी बनी हुई है। पूरे रास्ते पर जगह-जगह पढ़ने वाले पहाड़ी कस्बों में जरूरत का सारा सामान मिल जाता है। और सभी कस्बों में खाने पीने की सुविधा के लिए रेस्टोरेंट और रात में रुकने के लिए होटल भी बने हुए है।

  • समय: 9 घंटे 2 मिनट
  • दूरी: 287.7 किमी
  • रास्ता: एनएच 34 के माध्यम से
  • किराया: जिसका किराया ₹300 – ₹550 

ऋषिकेश से गंगोत्री धाम

हरिद्वार से 20 किलोमीटर के बाद ऋषिकेश पड़ता है। ऋषिकेश में पहली बार गंगा नदी पहाड़ों से उतर कर मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। लक्ष्मण झूला से जिसका विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। ऋषिकेश से पहाड़ी रास्ता शुरू हो जाता है। चीड़ के पेड़ों से आच्छादित हरे-भरे ऊंचे ऊंचे पहाड़ों के बीच बने घुमावदार रास्तों के बीच बसे पर्वतीय कस्बों, नरेंद्र नगर, चंपा, धरासू तक पहुंचा जाता है।

धरासू बैड से बाई ओर का रास्ता यमुनोत्री धाम को चला जाता है। तथा दाईं और का रास्ता उत्तरकाशी, मनेरी, आडवाणी गंगनानी, हरसिल से होते हुए गंगोत्री धाम की ओर जाता है।

  • समय: 8 घंटे 11 मिनट
  • दूरी: 267 किमी
  • रास्ता: एनएच 34 के माध्यम से
  • किराया: जिसका किराया ₹300 – ₹444  

धरासू बैंड से गंगोत्री धाम

धरासू बैंड से 26 किलोमीटर की दूरी पर स्थित। उत्तरकाशी एक सभी सुविधाओं से युक्त काफी बड़ा पर्वतीय शहर और जिला मुख्यालय है। उत्तरकाशी में बस स्टैंड से 300 मीटर की दूरी पर भगवान विश्वनाथ का प्राचीन शिव मंदिर है। उत्तरकाशी नगर से 16 किलोमीटर चलने के बाद मनेरी बांध आता है। मनेरी बांध के पास कुछ देर रुक कर चाय नाश्ता करने का अलग ही आनंद है।

  • समय: 4 घंटे 17 मिनट
  • दूरी: 129.5 किमी
  • रास्ता: एनएच 34 के माध्यम से
  • किराया: जिसका किराया ₹200 – ₹300

पायलट बाबा आश्रम से गंगोत्री धाम

मनेरी से 24 किलोमीटर की दूरी पर पायलट बाबा ( Pilot baba ashram kaya kalp peeth ) का आश्रम है। पायलट बाबा द्वारा यहां बहुत ही सुंदर आश्रम बनाया गया है। जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं की आदमकद मूर्तियां एवं शिव जी की विशाल मूर्ति बनाई गई है। जो देखने में बिल्कुल जीवंत लगती है।

गंगनानी में पराशर ऋषि आश्रम से गंगोत्री धाम

पायलट बाबा के आश्रम से भटवारी होते हुए 24 किलोमीटर चलने के बाद गंगनानी आता है। गंगनानी में पराशर ऋषि का आश्रम और मंदिर है। पराशर ऋषि के मंदिर के पास में गर्म जल के कुंड है। जिनमें पहाड़ों से निरंतर गर्म जल आता रहता है। श्रद्धालु इन गर्म कुंड में स्नान करके पराशर मंदिर में पूजा अर्चना करते है। गंगनानी से वातावरण बदलने लगता है। और ठंडी हवाओं के झोंके सर्दी का एहसास दिलाने लगते है।

  • समय: 52 मिनट
  • दूरी: 26 किमी
  • रास्ता: एनएच 34 के माध्यम से
  • किराया: जिसका किराया ₹40 – ₹100

हरसिल से गंगोत्री धाम

गंगनानी से 30 किलोमीटर चलने के बाद सेब के बागानों के लिए प्रसिद्ध पर्वतीय कस्बा हरसिल आता है। भागीरथी नदी के किनारे बसे हरसिल के चारों तरफ के पहाड़ों पर बर्फ से लदी चोटियाँ दिखाई देती है। जिन्हें देखकर यात्री आनंद मग्न हो जाते है।

हरसिल में होटल – हरसिल में काफी संख्या में अच्छे और साफ-सुथरे होटल बने हुए है। जिनका किराया मई-जून के महीनों में भी काफी कम रहता है। मई-जून में गंगोत्री जाने वाले यात्रियों को रात्रि विश्राम हरसिल में ही करना चाहिए।

मुखबा गांव से गंगोत्री धाम

हरसिल से 5 किलोमीटर की दूरी पर मुखबा गांव स्थित है। जहां गंगोत्री मंदिर के कपाट बंद होने के बाद, गंगा मां की शीतकालीन पूजा अर्चना की जाती है।

भैरव घाटी से गंगोत्री धाम

हरसिल से 16 किलोमीटर चलने के बाद देवदार के पेड़ों से घिरी भैरव घाटी आती है। भैरव घाटी में प्राचीन भैरव मंदिर बना है। भैरव मंदिर से गंगोत्री धाम की दूरी 8 किलोमीटर की है। गंगोत्री बर्फ से ढके हुए पहाड़ों की तलहटी में बसे एक छोटी सी नगर पंचायत है। जो समुद्र तल से 3042 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

अधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण गर्मियों में गंगोत्री का मौसम दिन में सुहावना रहता है। लेकिन शाम को 5 से 15 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। जिसके कारण यहां काफी सर्दी हो जाती है। इसलिए मित्रों गंगोत्री धाम की यात्रा करते समय गर्म कपड़े अपने साथ में अवश्य ले जाएं।

यहां रात में रुकने के लिए होटल और लॉज उपलब्ध है। जिनका किराया मई-जून में हजार ऊपर से ₹2000 तक होता है। और बाकी महीनों में यही कमरे ₹200 से ₹300 तक मिल जाते है। गंगोत्री मंदिर बस स्टैंड से 500 मीटर की दूरी पर भागीरथी नदी के किनारे स्थित है।

  • समय: 10 मिनट
  • दूरी: 6.2 किमी
  • रास्ता: एनएच 34 के माध्यम से
  • किराया: जिसका किराया ₹10 – ₹30

गोमुख के दर्शन

दोस्तों से श्रद्धालु गंगोत्री से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मां गंगा के उद्गम स्थल गोमुख के दर्शन करने के लिए भी जाते है।गोमुख की यात्रा काफी कठिन है। शारीरिक रूप से सक्षम यात्री ही गोमुख की यात्रा करते है। गोमुख जाने के लिए उत्तरकाशी स्थित एसडीएम ऑफिस से परमिशन लेनी पड़ती है। 1 दिन में केवल डेढ़ सौ यात्री ही गौमुख जा पाते है।